Hinduism Yoga

Graceful Joy as the Essence of the Delight of Brahman – I


By Santosh Kumari / रसानन्द ब्रह्मानन्द का पूर्वाभास – भाग 1  – संतोष कुमारी

Yoga as the science of consciousness not only teaches meditation but also shows the way to deal with elements of distraction that come in the way to sadhana.

The source of distraction is obviously fascination for the world outside. This fascination, in its turn, is rooted in our likings, desires and cravings for what looks captivating to us. The likings have their basis in our instinctual nature. Instincts for possession, protection, sex, etc. pre-possess our mind so extremely that rarely do they permit us to take up to anything like yoga which requires full engagement to get results.

How does one deal with these elements of diversion which inhibit us from taking up yogic sadhana and also keep us distracted throughout our life?

One of the solutions to this problem is repression of the instinctive desires and the correlated emotions in view of the splendour of the object before us. Yoga promises to make us reach the higher state of bliss but in doing so the baser desires and comforts of life are left unfulfilled in the expectation of it. This is the way Patanjali suggests, as is evident from his ideas of nirodha and vairagya. He also advises the aspirant not to attend to invitations of the agencies of higher planes of being, lest they would have to suffer the ordeals of the world again and again (Patanjali Yoga Sutra, III.51).

Different from it is the way shown by the Vedic Rishis. This is based on the realisation of the all-comprehending primacy of consciousness as against the contrast of Purusha and Prakriti underlying the system of Patanjali. Thus, purusha is different from prakriti and each purusha is different from other purushas. Hence, each one of them has no way out but to seek redemption from clutches of prakriti and her products such as desires and emotions. These desires and emotions arise when they interact with prakriti’s gunas. Nature of consciousness is blissful and is nature of existence. The reality can be characterised as an embodiment of bliss. In this regard we find in Taittiriya Upanishad that creation is rapture of consciousness. Consciousness nature is blissful.

The translation is as follows:

“Brahman as existent, created the world out of Itself. Since It created the world by Itself, it is created so well. What is created so well is really the rasa or essential bliss of It. It is by getting access to that essential bliss that one experiences joy in this world… It is the bliss of Brahman Itself which is the source of delight in whatever form or degree.”

Having proposed like this, the Upanishadic sage continues further:

“When anyone treats this world as different from the essential bliss, he cannot but be afraid of it.”

Contrary to it, the sage continues:

“When he is able to find out his status in that which is formless, bodiless, undefined and self-supported, he attains the state of fearlessness.” (Taittiriya Upanishad, II.7)

At the end, the sage points out that he, too, has the same fear. He knows very well that there is no difference between Brahman and Its creation. This fear is due to lack of experience of this truth. (Taittiriya Upanishad, II.7)

This passage of the Upanishad is important because it relates both to Yogic and aesthetic experience. As far as importance of Yogic experience is concerned, it lies in the experience of the delight. Yoga means unification of the object and the subject. This process involves withholding our mind from moving towards the world. It is achieved by remaining self-contained and contended within oneself. No doubt, this is a great achievement in life as this helps a person in relieving himself from the tiresome world and makes him grow stronger day by day.

This is an escapist view because it is a negative approach since while one becomes stronger inwardly he isolates himself from the world. This isolation is artificial because one separates himself from the creation. It is also full of danger in which the individual forced artificiality sooner or later drowns him. One may withdraw himself from the world but the onslaughts of the world will continue to trouble him. If he thinks the world is separate from him then it will react forcefully against him. The fear of the Upanishadic sage refers to this type of Yogi and such a yogi is criticised by him.

The Upanishad gives the solution for this type of yogi. It suggests that he should realize that Brahman is both transcendent and immanent. This is not theoretical but rather has to be experiential. Aesthetic experience can be utilized as a step to transform into source of delight as rasa while remaining in the world.

This is the Vedic approach.


चेतना (जागरूकता) के विज्ञान के रूप में योग न केवल ध्यान (समाधि) करना सिखाता है बल्कि साधना के रास्ते में आने वाले व्याकुलता के तत्वों से बाहर निकलने का तरीका भी दिखाता है। हमारे अंतर्मन में बाहरी दुनिया के लिए आकर्षण ही हमारी व्याकुलता का कारण है। यह सम्मोहन (आसक्ति), हमारी पसंद की इच्छाओं और लालच पर निर्भर करता है, जो हमको अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बाहरी वस्तुओं या मनुष्यों की ओर आसक्त होना हमारी मूल प्रवृति (स्वाभाविक) है। स्वाभाविक बुद्धि में यौन-क्रिया (Sex), अधिकार (दखल), बचाव (सुरक्षा) इत्यादि ने अपना पूर्वाधिकार इस हद तक बनाया हुआ है कि दिमाग इन सबसे निकल ही नहीं पाता और इसके भय के कारण मुश्किल ही कभी हमें योग की ओर अग्रसर होने की इजाज़त देता है, क्योंकि योग के नतीजे (परिणाम) पाने के लिए हमें वचनबद्ध होने की आवश्यकता होती है या हम कह सकते हैं की हमको वचनबद्ध होना पड़ता है। अब सवाल यह उठता है कि विकृतियों के इन तत्वों (कारणों) से कैसे निपटना है, जो हमें योग की ओर अग्रसर (आगे बढना) होने से रोकते हैं और हमें जीवन में विचलित (डगमगाना) भी रखते हैं।

इस समस्या के लिए कई समाधानों में से एक समाधान हमारे पास है – किसी वस्तु के प्रति जो हमारी स्वाभाविक इच्छाएं हैं, और उन इच्छाओं से जुडी जो हमारी भावनाएं हैं उनसे ऊपर उठ जाना। चूंकि, योग हमें वादा करता है कि वह हमें आनंद के उच्चतम स्तर तक ले जाने में हमारी मदद करेगा, लेकिन वहाँ तक पहुंचते – पहुंचते जीवन की आधारभूत इच्छाएं – जीवन के सुख की अपेक्षा में अधूरी रह जाती हैं। यही पतंजलि का सुझाव है, जैसा कि इनके निरोध और वैराग्य के विचारों से स्पष्ट है। वह आकांक्षी (साधक) को सलाह भी देते हैं कि वे उच्च अवस्था के प्रतिनिधियों (देवता आदि) के निमंत्रण को स्वीकार न करें, क्योंकि अगर वह ऐसा करते हैं तो उन्हें दुनिया की कड़ी परीक्षा को बार-बार भुगतना पड़ता है अर्थात उनकी (साधक) सारी शक्ति नष्ट हो जाती है और वह फिर आम मानव मात्र रह जाता है (पतंजलि योग सूत्र, III.51)।

वैदिक ऋषियों द्वारा दिखाया गया तरीका अलग है। वैदिक ऋषियों ने अनुभव किया कि चेतना सर्वज्ञ है एवं सर्वोपरि है, दृष्टा और दृश्य चेतना की अभिव्यक्ति हैं, जबकि पतंजलि पुरुष और प्रकृति को अलग-अलग मानता है। इस प्रकार, पुरुष प्रकृति से अलग है। प्रत्येक पुरूष अन्य पुरूषों से अलग है। इसलिए, उनमें से हर एक के पास कोई रास्ता नहीं है प्रकृति के चंगुल और उसके उत्पादों जैसे इच्छाओं और भावनाओं से मुक्ति पाने के सिवा। ये इच्छाएं और भावनाएं उत्पन्न होती हैं जब वे प्रकृति के गुणों के संपर्क में आते हैं। चेतना की प्रकृति आनंदित है और अस्तित्व की प्रकृति है। वास्तविकता को आनंद की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है। इस संबंध में हमें तैत्तरीय उपनिषद् से पता चलता है कि सृष्टि चेतना का आनंद है। चेतना की प्रकृति आनंदमय है।

अनुवाद इस प्रकार है:

“ब्रह्मन अस्तित्व है, सृष्टि उसी से निकली है। चूंकि इसने (ब्रह्मन) अपने आप से दुनिया बनाई है, यह बहुत अच्छी तरह से बनाई गई है। जो बहुत अच्छी तरह से बनाई गई है, वह वास्तव में रस है या इसका मूल आनंद है। जब हम उस आनंद में प्रवेश करते हैं तब हमें इस संसार के मूल आनंद का अनुभव होता है… यह ब्रह्मन का आनंद है, जो किसी भी रूप या स्थिति में प्रसन्नता का स्रोत है।”

इस तरह के विचार प्रस्तुत करने के बाद, उपनिषद् के मुनि आगे कहते हैं:

“जब इस संसार में कोई व्यक्ति सृष्टि के मूल को नहीं पहचानता कि सृष्टि का मूल ही आनंद है, तो वह इससे डरता है।”

इसके विपरीत, मुनि आगे कहते हैं:

“जब वह (मनुष्य) अपनी स्तिथि को जानने में सक्षम होता है कि वह निराकार है, अशरीरी है, जिसको परिभाषित नहीं किया जा सकता और वह आत्मनिर्भर है, तब वह निर्भिक हो जाता है।” (तैत्तरीय उपनिषद्, II .7)

अंत में, मुनि कहते हैं कि उनके अंदर भी वह डर है। वह बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि ब्रह्मन और उसकी सृष्टि में कोई अंतर नहीं है। यह भय इस सच्चाई के अनुभव की कमी के ही कारण है। (तैत्तरीय उपनिषद्, II .7)

उपनिषद् का यह विवरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह “यौगिक और रस अनुभव” दोनों से संबंधित है। जहां तक ​​यौगिक अनुभव का महत्व है, यह आनंद के अनुभव में है। योग का उद्देश्य विषय और विषयी का एकीकरण है। इस प्रक्रिया में हमारे मन को दुनिया की ओर बढ़ने से रोकना है। इसे आत्मनिर्भरता और खुद के भीतर के संतोष द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसमें कोई शक नहीं है, यह जीवन की एक महान उपलब्धि है। यह एक व्यक्ति को थकाऊ (नीरस) दुनिया से राहत देने में मदद करता है और उसे दिन-प्रतिदिन मजबूत बनाता है।

यह (पतंजलि योगसूत्र) एक पलायनवादी विचार है, क्योंकि यह एक नकारात्मक दृष्टिकोण है। इसमें कोई संदेह नहीं है, व्यक्ति (साधक) आंतरिक रूप से मजबूत हो जाता है, लेकिन वह खुद को दुनिया से अलग कर देता है। यह अलगाव अस्वाभाविक है क्योंकि उसने खुद को सृष्टि से अलग कर दिया है। यह भी खतरे से भरा है जिसमें व्यक्तिगत रूप से अस्वाभाविकता उसको जल्दी ही डुबो देती है। अगर कोई अपने आपको सृष्टि से अलग करता है, तो सृष्टि के हमले (उतार-चढ़ाव) उसे परेशान करना जारी रखेंगे। अगर वह सोचता है कि सृष्टि उससे अलग है तो वह (सृष्टि) उसके खिलाफ मजबूती से प्रतिक्रिया करेगी। उपनिषद् के मुनि इस प्रकार के योगी के भय को दर्शाते हैं और उस योगी की आलोचना करते हैं।

उपनिषद् इस प्रकार के योगी के लिए समाधान देता  है। उन्हें अहसास होना चाहिए कि ब्रह्मन लोकोत्तर (सब सीमाओं से बाहर) और सर्वव्यापी है। यह सैद्धांतिक नहीं है। यह अनुभवात्मक होना चाहिए। दुनियाँ में रहते हुए रस के अनुभव को रसानंद (रस के आनंद) में बदलने के लिए यह पहला कदम है। यही वैदिक दृष्टिकोण है।

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